सम्पादकीय…………………. नेपाल में बाढ़ ने अपनों को छीना, कानून ने अधिकार रोक दिए
सिद्धार्थनगर। प्राकृतिक आपदा किसी कानून, सीमा या प्रशासनिक व्यवस्था की अनुमति लेकर नहीं आती। कुछ घंटों का उफान वर्षों की कमाई बहा देता है। घर उजड़ते हैं, खेत डूबते हैं और कई बार परिवार का कोई सदस्य हमेशा के लिए लापता हो जाता है। नेपाल में भोटेकोशी की बाढ़ ने ऐसी ही त्रासदी छोड़ी है। लेकिन पानी उतरने के बाद प्रभावित परिवारों के सामने एक दूसरी चुनौती खड़ी हैकृउन अपनों की कानूनी स्थिति, जिनका अब तक कोई पता नहीं चल सका है। नेपाली कांग्रेस के सभापति गगन थापा ने सरकार से मांग की है कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों में लापता व्यक्तियों को मृत घोषित करने के लिए 12 वर्ष प्रतीक्षा करने की कानूनी बाध्यता में तत्काल संशोधन किया जाए। उन्होंने कानून, न्याय तथा संसदीय मामिला मंत्रालय का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित किया है। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था भोटेकोशी बाढ़ पीड़ित परिवारों के लिए अतिरिक्त कठिनाई पैदा कर रही है। मुलुकी देवानी संहिता, २०७४ की धारा 40 में लापता व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए 12 वर्ष की अवधि का प्रावधान है। इस व्यवस्था के पीछे कानूनी तर्क भी है। किसी व्यक्ति को केवल लंबे समय तक संपर्क में न रहने के आधार पर मृत घोषित करना उसके जीवन, पहचान, संपत्ति और कानूनी अधिकारों से जुड़ा गंभीर निर्णय है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में ऐसी प्रक्रिया में सावधानी जरूरी है, लेकिन हर परिस्थिति सामान्य नहीं होती। भोटेकोशी जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा में बड़ी संख्या में लोगों का एक साथ लापता होना सामान्य गुमशुदगी से अलग स्थिति है। कई परिवार धार्मिक परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार तक कर चुके हैं। सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर उन्होंने अपने प्रियजन की मृत्यु को स्वीकार कर लिया है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनकी स्थिति अब भी ‘लापता’ है। यही अंतर अब परिवारों के अधिकारों के रास्ते में बड़ी बाधा बन सकता है। मृत्यु प्रमाणपत्र केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। इसके आधार पर बैंक खाते, बीमा दावे, पैतृक संपत्ति का नामांतरण, पेंशन, राहत और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं। यदि किसी परिवार को इन अधिकारों के लिए 12 वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़े तो आपदा की चोट आर्थिक और प्रशासनिक संकट में बदल सकती है। न्यायिक प्रक्रिया के जरिए मृत्यु की घोषणा कराने का विकल्प मौजूद हो, तब भी अदालतों के चक्कर, दस्तावेजों की व्यवस्था और समय की लागत किसी संकटग्रस्त परिवार के लिए आसान नहीं होती। इसलिए आपदा के बाद कानूनी स्थिति स्पष्ट करना भी पुनर्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। कानून को न तो इतना कठोर होना चाहिए कि वास्तविक पीड़ितों के लिए राहत का रास्ता बंद हो जाए और न इतना सरल कि किसी संभावित जीवित व्यक्ति के अधिकार खतरे में पड़ जाएं। समाधान इन दोनों के बीच है। सरकार को आपदा, युद्ध, सामूहिक दुर्घटना और अन्य असाधारण घटनाओं के लिए विशेष कानूनी प्रक्रिया पर विचार करना चाहिए। ऐसी व्यवस्था में सामान्य 12 वर्ष की अवधि को परिस्थितियों के आधार पर कम किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए मजबूत सत्यापन व्यवस्था जरूरी होगी। खोज एवं बचाव अभियान के रिकॉर्ड, सरकारी सूचनाएं, प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्य तथा अन्य प्रमाणों के आधार पर समयबद्ध निर्णय की व्यवस्था बनाई जा सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यदि बाद में मृत घोषित व्यक्ति जीवित लौटता है तो उसकी पहचान, संपत्ति, बैंक खाते और अन्य कानूनी अधिकार तत्काल किस प्रक्रिया से बहाल किए जाएंगे। यानी सुधार का उद्देश्य कानून को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे असाधारण परिस्थितियों के योग्य बनाना होना चाहिए। भोटेकोशी त्रासदी ने आपदा प्रबंधन की एक और कमजोरी सामने रखी हैकृमृतकों और लापता लोगों के आंकड़ों में असंगति। आपदा के शुरुआती दौर में बचाव और पहचान की कठिनाइयों के कारण आंकड़ों में अंतर होना स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन समय बीतने के साथ सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह सत्यापित, एकीकृत और नियमित रूप से अद्यतन सूची सार्वजनिक करे। प्रशासन के लिए किसी सूची में दर्ज ‘लापता’ शब्द महज एक प्रविष्टि हो सकता है, लेकिन परिवार के लिए यह जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है। एक नाम के पीछे एक घर, एक आर्थिक व्यवस्था और कई रिश्ते होते हैं। इसलिए सही आंकड़ा केवल प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण नहीं, बल्कि पीड़ितों के प्रति राज्य की जवाबदेही भी है। आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री, अस्थायी आवास और बचाव अभियान तक सीमित नहीं होना चाहिए। आपदा के बाद नागरिकों की कानूनी स्थिति स्पष्ट करना भी पुनर्वास का हिस्सा है। जिस परिवार का कमाने वाला सदस्य लापता हो गया हो, उसके लिए बैंक खाता, बीमा, संपत्ति और पेंशन का सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना भोजन और आश्रय का। यदि कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं होगी तो राहत और पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया अधूरी रह जाएगी। इसके लिए एकल खिड़की व्यवस्था, विशेष प्रमाणपत्र प्रक्रिया, निःशुल्क कानूनी सहायता और समयबद्ध प्रशासनिक निर्णय जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं। गगन थापा की मांग को केवल राजनीतिक बयान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस कानूनी ढांचे पर पुनर्विचार का अवसर है, जो भविष्य की बड़ी आपदाओं में भी उपयोगी हो सकता है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के दौर में यह मानकर चलना कठिन है कि ऐसी घटनाएं हमेशा अपवाद ही रहेंगी। राज्य को आपदा के बाद केवल नुकसान का हिसाब नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ित परिवार अपने कानूनी अधिकारों तक आसानी से पहुंच सकें। इसके लिए विशेषज्ञों, कानूनविदों, आपदा प्रबंधन संस्थाओं और प्रभावित परिवारों से संवाद कर स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून की भाषा में मनुष्य दिखाई देना चाहिए। किसी मां के लिए बेटे का मृत्यु प्रमाणपत्र केवल एक कागज नहीं है। किसी बच्चे के लिए पिता की कानूनी स्थिति उसके भविष्य से जुड़ी हो सकती है। किसी परिवार के लिए संपत्ति का नामांतरण केवल जमीन का हस्तांतरण नहीं, बल्कि जीवन को दोबारा खड़ा करने का साधन हो सकता है। इसलिए आपदा के बाद कानूनी प्रक्रिया को संवेदनशील और सरल बनाना कल्याणकारी शासन का अनिवार्य हिस्सा है। भोटेकोशी की त्रासदी नेपाल के सामने भविष्य के लिए बेहतर कानूनी व्यवस्था बनाने का अवसर भी रखती है। संसद और सरकार को भावनात्मक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर स्थायी समाधान तैयार करना चाहिए। प्रकृति की मार को रोकना हमेशा मनुष्य के हाथ में नहीं होता। लेकिन उस मार के बाद नागरिक को दूसरी चोट से बचाना राज्य के हाथ में जरूर है। भोटेकोशी का पानी उतर चुका है। अब जरूरत है कि कानून की कठोरता भी वहां तक पहुंचे, जहां एक परिवार की वास्तविक जरूरत शुरू होती है। सामान्य नियम अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन असाधारण त्रासदी के लिए असाधारण संवेदनशीलता भी चाहिए। कानून की असली ताकत उसकी कठोरता में नहीं, बल्कि न्याय और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन बनाने की क्षमता में है। भोटेकोशी की त्रासदी आज नेपाल से यही सवाल पूछ रही हैकृक्या राज्य अपने कानून में पीड़ित के लिए इतनी जगह बना सकता है, जहां न्याय भी बचा रहे और इंसान भी?
