आज भी सेना के दिन याद कर चौड़ी हो जाती कैप्टन आरपी सिंह की छाती
दैनिक सत्ता मंत्र
बलरामपुर । कारगिल विजय दिवस को लेकर सैनिक उत्साहित हैं। जिले में कारगिल युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक तो नहीं, लेकिन जनरल मेजर संजय कुमार राव, युद्ध सेवा मेडल (सेवानिवृत्त) को 27 अगस्त 1983 में राष्ट्रपति द्वारा सेना के सिक्ख रेजिमेंट की 20वीं बटालियन में कमीशन दिया गया। 37 वर्ष के गौरवमयी सैन्य जीवन में जनरल संजय कुमार राव ने सेना के तकरीबन सभी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। अपनी बटालियन को जम्मू और कश्मीर एवं दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान सियाचिन ग्लेशियर में कमांड किया। उन्होंने 2004 के अमरनाथ यात्रा का संचालन भी किया। उन्हें युद्ध सेना मेडल से नवाजा गया है। जनरल आज भी सेना के दिनों को याद करके गौरव का अनुभूति करते हैं। -नगर के शिवाजीपुरम मुहल्ला निवासी सेवानिवृत्त कैप्टन रमेंद्र प्रताप सिंह कारगिल युद्ध की तीन माह की कार्रवाई याद करके भावुक हो उठते हैं। कारगिल युद्ध की शौर्यगाथा सुनाते हुए कहते हैं कि भारतीय सेना ने 26 जुलाई 1999 को युद्ध जीता था। तीन जुलाई से युद्ध घोषित हुआ था। इसी दिन एक चरवाह से सेना को पता चला कि सबसे उच्चतम पहाड़ी चोटी तोलोलिंग पर सेना की गतिविधि दिखी है। इस पर पांच जुलाई को पेट्रोलिंग भेजी गई, जिसमें कैप्टन सौरभ कालिया समेत पांच जवान बलिदान हो गए। सेना के हेड क्वार्टर व दिल्ली में इसकी सूचना दी गई। दोनों देशों के मध्य समझौता होता है कि सर्दी के मौसम में छह माह तक उच्चतम पहाड़ी पर कोई नहीं रहेगी, लेकिन पाकिस्तान ने धोखा देकर बर्फ के बीच होकर आते हुए उच्चतम चोटी पर कब्जा कर लिया। इसके पीछे पाक की मंशा कारगिल व बटालिक के साथ सियाचिन ग्लेशियर को कब्जाने की थी। इस मंशा पर भारतीय सेना ने पानी फेर दिया। कैप्टन रमेंद्र बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान वह पंजाब और जम्मू कश्मीर सीमा पर थे। युद्ध की जानकारी होने पर उनके मन में दुश्मनों को मात देने की इच्छा जागृत हुई, लेकिन उच्चाधिकारियों का आदेश नहीं हुआ। कैप्टन रमेंद्र बताते हैं कि पाकिस्तान ने युद्ध की कार्रवाई मई 1999 में ही शुरू कर दी थी। आठ मई को दोनों देशों में वार्ता हुई थी कि तोलोलिंग पहाड़ी पर कोई नहीं जाएगा। इसके बाद गतिविधि दिखने पर पाक ने मना कर दिया कि हमारे लोग वहां नहीं है। इस पर 13 जून को राजपूताना रायफल ने चढ़ाई शुरू की। दो जुलाई को जवाबी हमला हुआ। पांच जुलाई को सेना ने टाइगर हिल पर परचम लहरा दिया। सेना ने आर्टिलरी (तोपखाना) व बोफोर्स गन से पाकिस्तान का मस्तक झुका दिया। वास्तव में यह युद्ध तीन मई से 26 जुलाई तक चला था। कैप्टन रमेंद्र सिंह बताया कि युद्ध में तो नहीं जा सके, लेकिन समाप्ति के बाद उन्हें द्रास व कारगिल क्षेत्र में नियुक्ति मिली। इसके बाद 2013 में मास्टर ट्रेनर के रूप में यूपी डायल 112 के जवानों को प्रशिक्षित किया। कहा कि 26 जुलाई भारतीय सेना व समस्त देशवासियों के लिए गौरव का दिन है। इस ऐतिहासिक युद्ध में 565 लोग शहीद हुए। चार परमवीर चक्र एवं 10 सेना मेडल मिले हैं। बताया कि जम्मू के द्रास में आयोजित विजय दिवस पर बलरामपुर से दो पूर्व सैनिकों कैप्टन रमेंद्र प्रताप सिंह एवं सूबेदार राम नरायन सिंह को उनकी पत्नियों के साथ बीते 15 जुलाई को आमंत्रित किया गया। अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद की ओर से हुए कार्यक्रम में जिले के दोनों पूवै सैनिकों ने बलिदानियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
